मोदी सरकार ने किया जातिगत जनगणना का ऐलान: ओबीसी और दलित वोटरों को साधने की कोशिश

जानें विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया और क्या होगा इसका असर?

Apr 30, 2025 - 20:23
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मोदी सरकार ने किया जातिगत जनगणना का ऐलान: ओबीसी और दलित वोटरों को साधने की कोशिश
फोटो: पीएम नरेंद्र मोदी

नई दिल्ली, 30 अप्रैल 2025: केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए आगामी राष्ट्रीय जनगणना के साथ जातिगत जनगणना कराने की घोषणा की है। केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को इस प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसके तहत जनगणना फॉर्म में जाति का एक अलग कॉलम शामिल किया जाएगा। यह फैसला आजादी के बाद देश में पहली बार जातिगत जनगणना की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट बैठक के बाद इसकी जानकारी देते हुए कहा, "जातिगत जनगणना को मूल जनगणना के साथ समाहित किया जाएगा, ताकि नीति निर्माण में सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिले।"

लंबे समय से थी मांग

जातिगत जनगणना की मांग दशकों से विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों द्वारा उठाई जाती रही है। खासकर विपक्षी दल जैसे कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (सपा), राष्ट्रीय जनता दल (राजद), और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाते रहे हैं। विपक्ष का तर्क रहा है कि जातिगत आंकड़ों के अभाव में संसाधनों का समान वितरण और आरक्षण नीतियों का प्रभावी कार्यान्वयन संभव नहीं है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में अमेरिका दौरे पर भी इस मुद्दे को उठाया था, जबकि बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने 2023 में राज्य स्तर पर जातिगत सर्वेक्षण करवाकर इसकी शुरुआत की थी।

कैबिनेट का फैसला और राजनीतिक महत्व

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि यह निर्णय राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने लिया है। उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने 2011 की जनगणना में जातिगत आंकड़े एकत्र किए थे, लेकिन उन्हें कभी सार्वजनिक नहीं किया। वैष्णव ने दावा किया कि मोदी सरकार का यह कदम सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब भारत और पाकिस्तान के बीच पहलगाम आतंकी हमले को लेकर तनाव चरम पर है। कई विश्लेषकों का मानना है कि सरकार ने इस संवेदनशील समय में जातिगत जनगणना की घोषणा करके विपक्ष के एक बड़े मुद्दे को अपने पक्ष में करने की रणनीति अपनाई है।

विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाएं

मोदी सरकार के इस फैसले पर विपक्षी दलों ने मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है।

कांग्रेस: कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इसे "देर से लिया गया सही फैसला" करार दिया। उन्होंने कहा, "हमने इसकी मांग लंबे समय से की थी। मैंने संसद में कई बार यह मुद्दा उठाया और प्रधानमंत्री को पत्र भी लिखा। यह सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।" कांग्रेस ने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर भी इसे अपनी मांग की जीत बताया।

राष्ट्रीय जनता दल (राजद): राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने सरकार पर तंज कसते हुए कहा, "जातिगत जनगणना की मूल पहल 1996-97 में जनता दल की थी। अब मोदी सरकार हमारी मांग को मानने को मजबूर हुई है।" वहीं, तेजस्वी यादव ने इसे "विपक्ष की जीत" करार देते हुए कहा, "मोदी सरकार पहले इसका विरोध करती थी, लेकिन अब हमारे एजेंडे पर चल रही है।"

लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास): केंद्रीय मंत्री और लोजपा (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान ने जातिगत जनगणना का समर्थन किया, लेकिन चेतावनी दी कि इसके आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे जातिवाद को बढ़ावा मिल सकता है। उन्होंने कहा, "जातिगत आंकड़े सरकार को कल्याणकारी योजनाओं के लिए चाहिए, लेकिन इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।"

समाजवादी पार्टी (सपा): सपा नेता अखिलेश यादव ने इस फैसले का स्वागत किया, लेकिन इसे "चुनावी मजबूरी" करार दिया। उन्होंने कहा, "बीजेपी ने बिहार और यूपी में ओबीसी वोटों के खिसकने के डर से यह फैसला लिया है। हमारी मांग थी कि जातिगत जनगणना के साथ आरक्षण की 50% सीमा भी हटाई जाए।"

बीजू जनता दल (बीजद) और अन्य: बीजद ने भी इस फैसले का समर्थन किया, जबकि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने अभी तक कोई स्पष्ट रुख नहीं अपनाया है।

बिहार में सियासी हलचल

बिहार में इस फैसले ने राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री मोदी को धन्यवाद देते हुए कहा कि यह बिहार के जातिगत सर्वेक्षण की सफलता का परिणाम है। वहीं, राजद और कांग्रेस ने इसे अपनी मांग की जीत बताकर श्रेय लेने की होड़ शुरू कर दी है। बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा और गर्म होने की संभावना है।

विश्लेषकों की राय

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला बीजेपी के लिए जोखिम और अवसर दोनों लेकर आया है। एक ओर, यह ओबीसी और दलित वोटरों को लुभाने का मौका दे सकता है, जो हाल के चुनावों में विपक्ष की ओर झुके थे। दूसरी ओर, सवर्ण और कुछ अनुसूचित जाति समुदायों में इसके खिलाफ नाराजगी की आशंका है।

आगे की राह

हालांकि सरकार ने जातिगत जनगणना की घोषणा कर दी है, लेकिन इसकी समयसीमा और कार्यान्वयन को लेकर अभी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रक्रिया को पारदर्शी और वैज्ञानिक तरीके से लागू करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी। साथ ही, आंकड़ों के दुरुपयोग और जातिवादी राजनीति की आशंका भी बनी रहेगी।

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