पद और शक्ति का काला कारनामा: जीएसटी अफसरों ने मिर्जापुर-सोनभद्र में खरीदे अरबों के खनिज पहाड़
नोटबंदी की कमाई से भरी तिजोरियां
Daily News Mirror| Mirzapur News
लखनऊ, 6 अक्टूबर 2025: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में भ्रष्टाचार का एक नया अध्याय खुल रहा है, जहां जीएसटी विभाग के वरिष्ठ अफसरों पर अरबों रुपये की काली कमाई को सफेद करने के लिए मिर्जापुर और सोनभद्र जिलों में पूरे-पूरे पहाड़ खरीदने का आरोप लगा है। ये पहाड़ डोलो स्टोन, सैंड स्टोन और लाइम स्टोन जैसे बहुमूल्य खनिजों से भरपूर हैं, जिनकी सालाना रॉयल्टी ही 20-30 करोड़ रुपये प्रति पहाड़ तक पहुंचती है। विभागीय सिंडिकेट और बिल्डर्स की मिलीभगत से चल रहे इस अवैध खनन के खेल ने सरकारी राजस्व को अरबों का चूना लगाया है, जबकि जनता के प्राकृतिक संसाधनों की लूट मच रही है।
शासन के सूत्रों के अनुसार, यह घोटाला नोटबंदी के दौरान हुई अकूत कमाई से जुड़ा है। जीएसटी अफसरों ने विभाग में एक संगठित सिंडिकेट गठित कर टेंडर प्रक्रिया में हेराफेरी की। सोनभद्र में डोलो स्टोन का आधिकारिक दर 160 रुपये प्रति घन मीटर था, जिसे सिंडिकेट ने 3,000 रुपये तक पहुंचा दिया। इसी तरह, मिर्जापुर में सैंड स्टोन का दर 110 रुपये से बढ़ाकर 1,000 रुपये प्रति घन मीटर कर दिया गया। एक पहाड़ पर सालाना 1 से 5 लाख घन मीटर खनन की क्षमता होती है, जिसकी रॉयल्टी ही करोड़ों में है। लेकिन अफसरों ने इन्हें अपनी निजी संपत्ति बना लिया, और जांच से बचने के लिए कई पहाड़ों को जल्दी-जल्दी सरेंडर कर दिया।
इस मामले की शुरुआती जांच में खुलासा हुआ है कि ये अफसर न केवल खनन लीज हासिल करने के लिए रिश्वत ले रहे थे, बल्कि बिल्डर्स और ठेकेदारों के साथ मिलकर अवैध कमीशन का जाल बुन रखा था। सोनभद्र के गुरमा, कनाच, बाबुहारी और रोहतास क्षेत्रों में उच्च गुणवत्ता वाले लाइम स्टोन के भंडार हैं, जो सीमेंट उद्योग के लिए वरदान हैं। मिर्जापुर के आहिरौरा और आसपास के इलाकों में सैंड स्टोन प्रचुर मात्रा में मिलता है, जो सड़क निर्माण में इस्तेमाल होता है। लेकिन इन संसाधनों का दोहन अब जनहित के बजाय अफसरों की जेब भरने के लिए हो रहा है। एक अनुमान के मुताबिक, इस सिंडिकेट से सालाना सरकारी खजाने को 100 करोड़ से अधिक का नुकसान हो रहा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की 'जीरो टॉलरेंस' नीति के बावजूद यह भ्रष्टाचार कैसे पनप रहा है, यह सवाल उठना लाजमी है। शासन स्तर पर जांच के आदेश दिए गए हैं, और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की नजर भी इस पर है। पूर्वांचल के इन जिलों में पहले से ही कोयला, बॉक्साइट और अन्य खनिजों की लूट की शिकायतें थीं, लेकिन जीएसटी जैसे केंद्रीय विभाग के अफसरों का इसमें शामिल होना नया मोड़ है। स्थानीय पत्रकार विवेक त्रिपाठी ने सोशल मीडिया पर इसकी तीखी आलोचना की है, जहां उन्होंने लिखा, "जीएसटी अफसरों का भ्रष्टाचार एवरेस्ट से भी ऊंचा है।"
नागरिकों का आक्रोश: सोनभद्र और मिर्जापुर के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले किसान और आदिवासी समुदाय इस लूट से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। अवैध खनन से नदियां सूख रही हैं, जंगल कट रहे हैं, और पर्यावरणीय क्षति बढ़ रही है। एक स्थानीय निवासी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "ये अफसर हमारी जमीन पर कब्जा कर रहे हैं। जनता के संसाधन उनकी तिजोरी भर रहे हैं।" पर्यावरणविदों का कहना है कि इस तरह का खनन जल स्तर गिराने और मिट्टी कटाव का कारण बन रहा है, जो पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिकी को खतरे में डाल रहा है।
क्या होगा अगला कदम? शासन ने जीएसटी विभाग के संदिग्ध अफसरों की संपत्ति की जांच शुरू कर दी है। ईडी और सीबीआई जैसी एजेंसियों को शामिल करने की मांग तेज हो रही है। लेकिन सवाल वही है – जनता की जमीन और खनिजों पर अफसरों का हक कब से हो गया? यह मामला न केवल भ्रष्टाचार का प्रतीक है, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग का भी। अगर समय रहते कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो पूर्वांचल में बड़ा आंदोलन खड़ा हो सकता है।
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