यूपी सरकार को सुप्रीम कोर्ट की फटकार: प्रयागराज में बुलडोजर एक्शन पर 10-10 लाख का हर्जाना देने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने इस कार्रवाई को "उच्चस्तरीय दबंगई" करार देते हुए कहा कि...
प्रयागराज, 01 अप्रैल 2025: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और प्रयागराज विकास प्राधिकरण को कालीन नगरी प्रयागराज में बुलडोजर कार्रवाई को लेकर कड़ी फटकार लगाई है। शीर्ष अदालत ने इसे "असंवैधानिक" और "अमानवीय" करार देते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि जिन लोगों के घर गिराए गए, उन्हें प्रति परिवार 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। यह फैसला मंगलवार को जस्टिस एएस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने सुनाया, जिसमें कहा गया कि इस कार्रवाई ने "न्यायालय की अंतरात्मा को झकझोर दिया है।"
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बुलडोजर कार्रवाई के दौरान प्रभावित लोगों को नोटिस का जवाब देने के लिए "उचित अवसर" नहीं दिया गया। पीठ ने टिप्पणी की, "आवास का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न हिस्सा है। ऐसी कार्रवाई से पहले उचित प्रक्रिया का पालन जरूरी है।" यह मामला तब सामने आया जब वकील जुल्फिकार हैदर, प्रोफेसर अली अहमद और कुछ अन्य लोगों ने अपनी याचिका में दावा किया कि उनके घरों को सिर्फ एक रात पहले नोटिस देकर तोड़ दिया गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि प्रशासन ने गलती से उनकी जमीन को गैंगस्टर अतीक अहमद की संपत्ति मान लिया, जो 2023 में मारा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस कार्रवाई को "उच्चस्तरीय दबंगई" करार देते हुए कहा कि यह न केवल कानून के शासन के खिलाफ है, बल्कि नागरिकों के मूल अधिकारों का भी हनन करता है। कोर्ट ने प्रयागराज विकास प्राधिकरण को छह सप्ताह के भीतर मुआवजा देने का निर्देश दिया और चेतावनी दी कि ऐसी कार्रवाइयों से "गलत और चौंकाने वाला संदेश" जाता है।
इससे पहले भी कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को बुलडोजर कार्रवाई के लिए आड़े हाथों लिया था। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने दावा किया कि प्रशासन ने जल्दबाजी में कार्रवाई की और प्रभावित लोगों को अपनी बात रखने का मौका तक नहीं दिया। दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश हुए अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने दलील दी कि नोटिस देने में "पर्याप्त प्रक्रिया" का पालन किया गया था, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। स्थानीय लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया है। प्रभावित परिवारों में से एक के सदस्य ने कहा, "हमें अचानक बेघर कर दिया गया था। अब कोर्ट के इस फैसले से थोड़ी राहत मिली है।" वहीं, विपक्षी दलों ने इसे योगी सरकार की "बुलडोजर नीति" पर करारा प्रहार बताया है। इस घटना ने एक बार फिर "बुलडोजर जस्टिस" पर बहस छेड़ दी है, जिसमें कई लोग इसे कानून के दुरुपयोग का प्रतीक मानते हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में ऐसी कार्रवाइयों से पहले उचित नोटिस और सुनवाई अनिवार्य होगी, ताकि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।
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