यूपी में बंद कमरे में 52 ब्राह्मण विधायकों की बैठक से सियासी तापमान बढ़ा, जानें आखिर क्या है ब्राह्मणों के नाराजगी की वजह?
मिर्जापुर विधायक रत्नाकर मिश्रा ने की बैठक की अगुवाई, भदोही में ब्राह्मण समाजसेवी की हत्या का मुद्दा भी उठाया
Daily News Mirror| Uttar Pradesh News
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर जातीय समीकरण उफान पर हैं। मंगलवार शाम (23 दिसंबर 2025) को कुशीनगर से भाजपा विधायक पंचानंद पाठक (पी.एन. पाठक) के लखनऊ स्थित आवास पर करीब 45-50 ब्राह्मण विधायकों और विधान परिषद सदस्यों की बैठक हुई, जिसने सूबे का सियासी पारा चढ़ा दिया है। यह बैठक विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान हुई, जहां 'सहभोज' (सामुदायिक भोज) के नाम पर विधायकों ने ब्राह्मण समुदाय की राजनीतिक उपेक्षा पर चर्चा की। बैठक में मुख्य रूप से भाजपा के ब्राह्मण विधायक शामिल थे, लेकिन अन्य दलों के कुछ ब्राह्मण विधायक भी पहुंचे। इस जुटान ने भाजपा के भीतर असंतोष की आग को हवा दी है, खासकर तब जब ठाकुर, कुर्मी और लोध समुदायों के विधायकों की ऐसी ही बैठकें पहले हो चुकी हैं।
बैठक की पृष्ठभूमि और शामिल होने वाले नेता
उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 52 ब्राह्मण विधायक हैं, जिनमें से 46 भाजपा से हैं। मंगलवार की बैठक में पूर्वांचल और बुंदेलखंड क्षेत्र के विधायकों का दबदबा रहा। प्रमुख नामों में शामिल हैं: प्रेम नारायण पांडेय (तरबगंज), रत्नाकर मिश्र (मिर्जापुर), श्रीप्रकाश द्विवेदी, विनय द्विवेदी (मेहनौन), एमएलसी सकेत मिश्र, शलभ मणि त्रिपाठी (देवरिया), विवेकानंद पांडेय, ऋषि त्रिपाठी (नौतनवा), रमेश मिश्र (बदलापुर), अंकुर राज तिवारी (खलीलाबाद), राकेश गोस्वामी (महोबा), कैलाश नाथ शुक्ला, ज्ञान तिवारी, और अन्य जैसे विपुल दुबे (ज्ञानपुर), विनोद चतुर्वेदी, संजय शर्मा, अनिल त्रिपाठी, सुभाष त्रिपाठी, अनिल पराशर, सुनील दत्त द्विवेदी, एमएलसी धर्मेंद्र सिंह और बाबूलाल तिवारी। बैठक की आयोजन में मिर्जापुर विधायक रत्नाकर मिश्र और एमएलसी उमेश द्विवेदी की मुख्य भूमिका रही।
बैठक को पाठक की पत्नी के जन्मदिन के अवसर पर आयोजित किया गया, जहां लिट्टी-चोखा और व्रत का प्रसाद परोसा गया। लेकिन यह सिर्फ एक सामाजिक आयोजन नहीं था; बंद कमरे में करीब दो घंटे तक चली चर्चा में ब्राह्मण समुदाय की राजनीतिक स्थिति पर गहन मंथन हुआ। सूत्रों के मुताबिक, जनवरी में एक और बैठक की योजना है, जहां समुदाय के राजनीतिक और सामाजिक हितों पर फैसला लिया जाएगा।
ब्राह्मणों की नाराजगी: क्या हैं मुख्य मुद्दे?
ब्राह्मण समुदाय, जो यूपी की कुल आबादी का 11-12% है, राजनीतिक रूप से मजबूत रहा है। यह समुदाय करीब 150 विधानसभा सीटों पर प्रभाव डालता है, खासकर पूर्वांचल (फैजाबाद, वाराणसी, गोरखपुर), मध्य यूपी (कानपुर, लखनऊ, प्रयागराज) और बुंदेलखंड (झांसी, हमीरपुर) में। 2022 चुनावों में ब्राह्मणों ने भाजपा को 89% वोट दिए, जिससे पार्टी को 46 ब्राह्मण विधायक मिले। लेकिन अब असंतोष बढ़ रहा है।
बैठक में चर्चा के मुख्य बिंदु
- राजनीतिक उपेक्षा: ब्राह्मणों की आवाज दबाई जा रही है। आरएसएस, सरकार और भाजपा में ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व कम हो रहा है। कोई वरिष्ठ ब्राह्मण पदाधिकारी नहीं है जो समुदाय की चिंताओं को उठाए।
- इटावा घटना का असर: हाल ही में इटावा में एक ब्राह्मण कथावाचक पर हमले (ब्राह्मण-यादव विवाद) के बाद कोई ब्राह्मण नेता नहीं पहुंचा, जबकि सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने उन्हें सम्मानित किया। इससे सोशल मीडिया पर 'ब्राह्मण एकता' जैसे पेजों पर 51 ब्राह्मण विधायकों की आलोचना हुई। परशुराम सेना संघ ने आरोप लगाया कि सभी पार्टियां ब्राह्मणों को कमजोर कर रही हैं।
- प्रतिनिधित्व की मांग: आबादी के अनुपात में राजनीतिक पद, ब्राह्मण मौतों पर आर्थिक मदद, गरीब ब्राह्मणों के लिए फंड बैंक (ब्यूरोक्रेट्स, रिटायर्ड जज, वकील, डॉक्टरों से), और एक प्रमुख ब्राह्मण चेहरे की जरूरत।
- भाजपा में असंतोष: डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक (ब्राह्मण) को पर्याप्त शक्ति नहीं दी गई। भाजपा नेता सुनील भारला ने पार्टी अध्यक्ष पद के लिए नामांकन की तैयारी की लेकिन रोक दिया गया।
अन्य घटनाएं जैसे लखनऊ, भदोही, गोण्डा और प्रयागपुर (बहराइच) की भी चर्चा हुई, जहां ब्राह्मणों के साथ अन्याय हुआ।
सियासी प्रभाव: योगी सरकार पर दबाव, विपक्ष की नजर
यह बैठक ठाकुर विधायकों की अगस्त में हुई 'कुटुंब परिवार' बैठक के बाद आई है, जहां 49 ठाकुर विधायकों में से 40 पहुंचे थे। कुर्मी और लोध समुदायों की बैठकें भी हो चुकी हैं। राजनीतिक गलियारों में कैबिनेट विस्तार की अटकलें हैं, और यह जुटान भाजपा के लिए चुनौती बन सकती है।
समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल यादव ने इस मौके पर टिप्पणी की: "सपा में आओ, सम्मान मिलेगा।" यह इशारा ब्राह्मणों के संभावित शिफ्ट की ओर है। इतिहास गवाह है कि ब्राह्मणों ने 2007 में बसपा (ब्राह्मण-दलित गठजोड़), 2012 में सपा, और 2017-2022 में भाजपा का साथ दिया। परशुराम सेना ने चेतावनी दी कि 2027 चुनावों में ब्राह्मणों को कमजोर करने वाली पार्टियों को जवाब मिलेगा।
आगे क्या? यह बैठक यूपी की जातीय राजनीति में नया मोड़ ला सकती है। ब्राह्मण, जो स्वतंत्रता के बाद 1989 तक छह मुख्यमंत्री दे चुके हैं, अब अपनी एकजुटता दिखा रहे हैं। अगर असंतोष बढ़ा, तो 2027 विधानसभा चुनावों में भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ एक शुरुआत है, और आने वाले दिनों में और जातीय बैठकें हो सकती हैं। योगी सरकार को ब्राह्मणों की चिंताओं को संबोधित करना होगा, वरना विपक्ष फायदा उठा सकता है।
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