पति को कंधे पर उठाकर 180 किलोमीटर की कांवड़ यात्रा पूरी कर आशा देवी ने कायम की मिसाल
Daily News Mirror| Ghaziabad, UP
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के मोदीनगर की रहने वाली आशा देवी ने अपने प्रेम, समर्पण और आस्था से एक ऐसी मिसाल कायम की है, जो रिश्तों की मर्यादा और भक्ति की नई परिभाषा गढ़ रही है। आशा ने अपने दिव्यांग पति सचिन कुमार को कंधे पर उठाकर हरिद्वार से 180 किलोमीटर की कठिन कांवड़ यात्रा पूरी की। यह यात्रा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बनी, बल्कि पति-पत्नी के अटूट बंधन और नारी शक्ति का भी उदाहरण बन गई।
यात्रा की शुरुआत और प्रेरणा
आशा देवी ने 14 जुलाई को हरिद्वार की हर की पौड़ी से गंगाजल लेकर अपनी यात्रा शुरू की। उनके पति सचिन, जो पहले एक कॉन्ट्रैक्टर थे, पिछले साल रीढ़ की हड्डी की सर्जरी के बाद चलने-फिरने में असमर्थ हो गए। सचिन पिछले 13 सालों से हर साल कांवड़ यात्रा करते थे, लेकिन इस बार उनकी असमर्थता के कारण यह संभव नहीं था। पति के इस मलाल को देखकर आशा ने फैसला किया कि वे सचिन को अपनी पीठ पर बिठाकर उनकी इच्छा पूरी करेंगी। आशा ने इसे एक व्रत की तरह लिया और अपने दो बच्चों के साथ इस कठिन यात्रा पर निकल पड़ीं।
कठिनाइयों से भरा सफर, लेकिन अटूट हौसला
आशा की यह यात्रा आसान नहीं थी। नौ दिनों तक 180 किलोमीटर का सफर तय करते हुए उन्हें तेज धूप, बारिश, थकान और पति के वजन का बोझ सहना पड़ा। फिर भी, उनकी भक्ति और पति के प्रति समर्पण ने उन्हें कभी रुकने नहीं दिया। रास्ते में लोग उनकी इस अनूठी भक्ति को देखकर दंग रह गए। कई जगहों पर लोगों ने ढोल-नगाड़ों के साथ उनका स्वागत किया, फूल बरसाए और श्रद्धा से नमन किया। कुछ लोग भावुक होकर उनकी हिम्मत की सराहना करते हुए आशा को 'नारी शक्ति' और 'सच्ची जीवनसंगिनी' का दर्जा दे रहे थे।
परिवार की स्थिति और आशा की जिम्मेदारी
आशा देवी का परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। सचिन पहले घर के अकेले कमाने वाले थे, जो पेंटिंग और पीओपी का काम करते थे। लेकिन उनकी बीमारी के बाद परिवार की जिम्मेदारी आशा के कंधों पर आ गई। आशा सिलाई और थैला बनाने का छोटा-सा काम करके परिवार का पालन-पोषण करती हैं। कई बार घर में सब्जी तक नहीं बन पाती, और बच्चे सूखी रोटी या चटनी के साथ गुजारा करते हैं। सचिन का इलाज आयुष्मान कार्ड के जरिए हुआ, जिसके लिए आशा सरकार की आभारी हैं। उन्होंने भगवान शिव से पति के स्वास्थ्य और परिवार के लिए रोजगार की प्रार्थना की है।
सामाजिक संदेश और स्वागत
22 जुलाई को जब आशा अपने गांव बखरवा पहुंचीं, तो ग्रामीणों ने ढोल-नगाड़ों और फूल-मालाओं के साथ उनका भव्य स्वागत किया। सोशल मीडिया पर भी उनकी यह कहानी वायरल हो रही है, जहां लोग उनके प्रेम और समर्पण की तारीफ कर रहे हैं। आशा ने कहा, "पति की सेवा में ही मेवा है, बाकी सब व्यर्थ है।" उनकी यह बात समाज में उन लोगों के लिए एक संदेश है, जो रिश्तों को हल्के में लेते हैं।
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